Suttanipātapāli - Uragasuttaṃ | सुत्तनिपातपालि - उरगसुत्तं

 सुत्तनिपातपालि - उरगसुत्तं

Suttanipātapāli - Uragasuttaṃ

 शाक्यमुनि बुद्ध के बहुमूल्य  वचनों का संग्रह, भगवान (बुद्ध)  के महापरिनिब्बान (महापरिनिर्वाण) के बाद प्रथम धम्मसंगति में ही, भिक्खु महाकाश्य के कहने पर तिपिटक के रूप में लिख कर संकलित कर लिया गया था। तिपिटक में ग्रन्थों का संग्रह तीन पिटकों के रूप में है, जिसमें विनय पिटक, सुत्त पिटक व अभिधम्म पिटक के रूप में संकलित है। सुत्तपिटक पाँच निकयों में विभक्त है, जैसे दीघनिकाय, मज्झिमनिकाय, संयुत्तनिकाय, अंङ्गुत्तरनिकाय एवं खुद्दकनिकाय। खुद्दकनिकाय में 15 ग्रन्थ संकलित हैं।  सुत्तनिपात, खुद्दकनिकाय का पाँचवा ग्रन्थ है।  सुत्तनिपात ग्रन्थ को बुद्धवचनामृत भी कहा जाता है। इस सुत्त का उपदेश बुद्ध ने सावत्थी के जेतवन विहार में भिक्षुओं को दिया था। सुत्तनिपात पाँच वग्गों (वर्गों) में है जिसमें कि 72 संकलित हैं। पहला वग्ग उरग-वग्ग है जिसमें 12 सुत्तों का संकलन हैं। दुसरा वग्ग चूळ-वग्ग है जिसमें 14 सुत्तों का संकलन हैं। तीसरा वग्ग महा-वग्ग है जिसमें 12 सुत्त हैं। चौथा वग्ग अट्ठक-वग्ग है जिसमें 16 सुत्त हैं। पाँचवा वग्ग पारायण-वग्ग है जिसमें 18 सुत्तों का संकलन है। सुत्तनिपात की सरचना धम्मपद के समान है। सुत्तनिपात तिपिटक के अन्तर्गत प्राचीन ग्रन्थों में से एक है। भाषा, भाव, शैली इत्यादि के आधार पर विद्वानों द्वारा इसकी प्राचीनता सिद्ध की गई है। 

विद्वानों के मतानुसार -

1. डॉ0 बापट के अनुसार - यह पालि तिपिटक का प्रथम गाथा-संग्रह है। धम्मपद, खुद्दकपाठ, उदान, इतिवुत्तक, थेरगाथ, थेरीगाथा, बुद्धवंस, चरियापिटक एवं अपदान जैसे ग्रन्थ वाद के हैं।
2. प्रो0 रिस्डेविडस के अनुसार - सुत्तनिपात किसी एक समय किसी व्यक्ति द्वारा किया गया संग्रह नहीं है, अपितु समय-समय पर संघ द्वारा किये गये सामूहिक प्रयत्नों का फल है।
3. डॉ0 विक्रमसिंह के अनुसार - सुत्तनिपात के वर्गों और चुने हुए सुत्तों की आपेक्षिक प्राचीनता को निश्चित करने का प्रयत्न किया है।

Uragasuttaṃ | उरगसुत्त

उरगसुत्त उरग वग्ग का पहला सुत्त है, जिसमें 17 गाथाएँ हैं। यह सुत्त बौद्ध दर्शन के मूल तत्वों—क्लेशों से मुक्ति, शील, ध्यान, और निर्वाण—को सर्प की तुलना से समझाता है। सर्प अपनी पुरानी त्वचा को छोड़ देता है और नई अवस्था में आगे बढ़ता है, वैसे ही भिक्खु क्रोध, लोभ, मोह, आदि क्लेशों को छोड़कर निर्वाण प्राप्त करता है। यह सुत्त सरल भाषा में है, और प्रत्येक गाथा में "उरगो जिण्णंव तच्छं पुराणं" (जैसे सर्प पुरानी त्वचा को छोड़ देता है) का रिफ्रेन ) दोहराया जाता है, जो सुत्त को काव्यात्मक बनाता है।

सुत्त का मुख्य उद्देश्य: क्लेशों का त्याग। यह भिक्खु को सिखाता है कि सांसारिक बंधनों को छोड़कर शांत और मुक्त जीवन जीएँ। यह प्रतीकात्मक रूप से सर्प की तरह "छोड़ने" ) की प्रक्रिया पर जोर देता है। सुत्त की संरचना: प्रत्येक गाथा एक क्लेश (जैसे क्रोध, लोभ) का वर्णन करती है, और अंत में बताती है कि क्लेश-मुक्त व्यक्ति संसार से पार हो जाता है।

𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑁄 𑀉𑀧𑁆𑀧𑀢𑀺𑀢𑀁 𑀯𑀺𑀦𑁂𑀢𑀺 𑀓𑁄𑀥𑀁, 𑀯𑀺𑀲𑀝𑀁 𑀲𑀧𑁆𑀧𑀯𑀺𑀲𑀁𑀯 𑀑𑀲𑀥𑁂𑀳𑀺𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यो उप्पतितं विनेति कोधं, विसटं सप्पविसंव ओसधेहि।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यः समुत्थितं विनयति क्रोधं, विषटं सर्पविषमिवौषधैः।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्।।


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जो, फैलते सर्प विष को औषधि की तरह, चढे क्रोध को शांत कर देता है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।।


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑁄 𑀭𑀸𑀕𑀫𑀼𑀤𑀘𑁆𑀙𑀺𑀤𑀸 𑀅𑀲𑁂𑀲𑀁, 𑀪𑀺𑀲𑀧𑀼𑀧𑁆𑀨𑀁𑀯 𑀲𑀭𑁄𑀭𑀼𑀳𑀁 𑀯𑀺𑀕𑀬𑁆𑀳𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁, 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यो रागमुदच्छिदा असेसं, भिसपुप्फंव सरोरुहं विगय्ह।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं, पुराणं ।। 2।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यः रागमुदच्छिदति असेशं, भिसपुष्पमिव सरोरुहं विगृह्य।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जो, तालाब में उतरकर कमल पुष्प तोड देने की तरह, नि शेष राग को नष्ट कर देता है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।।


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑁄 𑀢𑀡𑁆𑀳𑀫𑀼𑀤𑀘𑁆𑀙𑀺𑀤𑀸 𑀅𑀲𑁂𑀲𑀁, 𑀲𑀭𑀺𑀢𑀁 𑀲𑀻𑀖𑀲𑀭𑀁 𑀯𑀺𑀲𑁄𑀲𑀬𑀺𑀢𑁆𑀯𑀸𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यो तण्हमुदच्छिदा असेसं, सरितं सीघसरं विसोसयित्वा।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 3 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यः तृष्णामुदच्छिदति अशेषं, सरितं शीघ्रस्रवं विशोषयित्वा।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जो, शीघ्रगामी तृष्णा रूपी सरिता को सुखा कर उसका नाश कर देता है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।।


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑁄 𑀫𑀸𑀦𑀫𑀼𑀤𑀩𑁆𑀩𑀥𑀻 𑀅𑀲𑁂𑀲𑀁, 𑀦𑀴𑀲𑁂𑀢𑀼𑀁𑀯 𑀲𑀼𑀤𑀼𑀩𑁆𑀩𑀮𑀁 𑀫𑀳𑁄𑀖𑁄𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यो मानमुदब्बधी असेसं, नळसेतुंव सुदुब्बलं महोघो।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 4 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यः मानमुदवधी अशेषं, नलसेतुंव सुदुर्बलं महोघः।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जो, सरकढों का बना दुर्बल पुल को बहा ले जानेवाली बाढ की तरह, नि शेष मान का नाश करता है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।।


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑁄 𑀦𑀸𑀚𑁆𑀛𑀕𑀫𑀸 𑀪𑀯𑁂𑀲𑀼 𑀲𑀸𑀭𑀁, 𑀯𑀺𑀘𑀺𑀦𑀁 𑀧𑀼𑀧𑁆𑀨𑀫𑀺𑀯 𑀉𑀤𑀼𑀫𑁆𑀩𑀭𑁂𑀲𑀼𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यो नाज्झगमा भवेसु सारं, विचिनं पुप्फमिव उदुम्बरेसु ।   

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 5।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यः नाध्यगमद् भवेषु सारं, विचिनन् पुष्पमिव उदुम्बरेषु।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जो, गूलर में फूल खोजने की तरह, संसार में कुछ सार नही देखता, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।।


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑀲𑁆𑀲𑀦𑁆𑀢𑀭𑀢𑁄 𑀦 𑀲𑀦𑁆𑀢𑀺 𑀓𑁄𑀧𑀸, 𑀇𑀢𑀺𑀪𑀯𑀸𑀪𑀯𑀢𑀜𑁆𑀘𑀯 𑀯𑀻𑀢𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑁄𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यस्सन्तरतो न सन्ति कोपा, इतिभवाभवतञ्‍च वीतिवत्तो।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 6 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यस्यान्तरतः न सन्ति कोपाः, इति भवाभवं च वीतिवृत्तः।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जिसके अन्दर कोप नहीं और जो पुण्य तथा पाप से परे है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।।


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑀲𑁆𑀲 𑀯𑀺𑀢𑀓𑁆𑀓𑀸𑀸 𑀯𑀺𑀥𑀽𑀧𑀺𑀢𑀸, 𑀅𑀚𑁆𑀛𑀢𑁆𑀢𑀁 𑀲𑀼𑀯𑀺𑀓𑀧𑁆𑀧𑀺𑀢𑀸 𑀅𑀲𑁂𑀲𑀸𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यस्स वितक्‍का विधूपिता, अज्झत्तं सुविकप्पिता असेसा।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 7 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यस्य विचाराः विधूपिताः, अध्यात्मं सुविकल्पिताः अशेषाः।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जिसके विर्तक नष्ट हो गये हैं और जिसका चित्त पूर्णतया संयत है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।।


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑁄 𑀦𑀸𑀘𑁆𑀘 𑀲𑀸𑀭𑀻 𑀦 𑀧𑀘𑁆𑀘𑀸𑀲𑀸𑀭𑀻, 𑀲𑀩𑁆𑀩𑀁 𑀅𑀘𑁆𑀘 𑀕𑀫𑀸 𑀇𑀫𑀁 𑀧𑀧𑀜𑁆𑀘𑀁𑀳𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यो नाच्‍चसारी न पच्‍चसारी, सब्बं अच्‍चगमा इमं पपञ्‍चं।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 8 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यः नात्यासारति न प्रत्यसारति, सर्वं अत्यगमद् इमं प्रपञ्चम्।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जो न अति शीघ्रगामी है और न अति मन्दगामी, जिसने सभी प्रपञ्चों को पार कर लिया है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।।


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑁄 𑀦𑀸𑀘𑁆𑀘𑀼𑀲𑀸𑀭𑀻 𑀦 𑀧𑀘𑁆𑀘,𑀲𑀸𑀭𑀻, 𑀲𑀩𑁆𑀩𑀁 𑀯𑀺𑀢𑀣𑀫𑀺𑀤𑀦𑁆𑀢𑀺 𑀜𑀢𑁆𑀯𑀸 𑀮𑁄𑀓𑁂𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यो नाच्‍चसारी न पच्‍चसारी, सब्बं वितथमिदन्ति ञत्वा लोके।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 9 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यः नात्यासारति न प्रत्यसारति, सर्वं वितथमिदमिति ज्ञात्वा लोके।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जो न अति शीघ्रगामी है और न अति मन्दगामी, जिसने संसार की असारता को समझ लिया है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।।


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑁄 𑀦𑀸𑀘𑁆𑀘𑀼𑀲𑀸𑀭𑀻 𑀦 𑀧𑀘𑁆𑀘𑀢𑀲𑀸𑀭𑀻, 𑀲𑀩𑁆𑀩𑀁 𑀯𑀺𑀢𑀣𑀫𑀺𑀤𑀦𑁆𑀢𑀺 𑀯𑀻𑀢𑀮𑁄𑀪𑁄𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यो नाच्‍चसारी न पच्‍चसारी, सब्बं वितथमिदन्ति वीतलोभो।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 10 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यः नात्यासारति न प्रत्यसारति, सर्वं वितथमिदमिति वीतलोभः।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जो न अति शीघ्रगामी है और न अति मन्दगामी, जो सबको असार जान कर लोभ रहित हो गया है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।।


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑁄 𑀦𑀸𑀘𑁆𑀘𑀭𑀲𑀸𑀭𑀻 𑀦 𑀧𑀘𑁆𑀘𑀉𑀲𑀸𑀭𑀻, 𑀲𑀩𑁆𑀩𑀁 𑀯𑀺𑀢𑀣𑀫𑀺𑀤𑀦𑁆𑀢𑀺 𑀯𑀻𑀢𑀭𑀸𑀕𑁄𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यो नाच्‍चसारी न पच्‍चसारी, सब्बं वितथमिदन्ति वीतरागो।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 11 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यः नात्यासारति न प्रत्यसारति, सर्वं वितथमिदमिति वीतरागः।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जो न अति शीघ्रगामी है और न अति मन्दगामी, जो सबको असार जान कर राग-रहित हो गया है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।।


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑁄 𑀦𑀸𑀘𑁆𑀘𑀼𑀲𑀸𑀭𑀻 𑀦 𑀧𑀘𑁆𑀘,𑀲𑀸𑀭𑀻, 𑀲𑀩𑁆𑀩𑀁 𑀯𑀺𑀢𑀣𑀫𑀺𑀤𑀦𑁆𑀢𑀺 𑀯𑀻𑀢𑀤𑁄𑀲𑁄𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यो नाच्‍चसारी न पच्‍चसारी, सब्बं वितथमिदन्ति वीतदोसो।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 12 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यः नात्यासारति न प्रत्यसारति, सर्वं वितथमिदमिति वीतदोषः।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जो न अति शीघ्रगामी है और न अति मन्दगामी, जो सबको असार जान कर द्वेषरहित हो गया है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।। 


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑁄 𑀦𑀸𑀘𑁆𑀘𑀼𑀲𑀸𑀭𑀻 𑀦 𑀧𑀘𑁆𑀘,𑀲𑀸𑀭𑀻, 𑀲𑀩𑁆𑀩𑀁 𑀯𑀺𑀢𑀣𑀫𑀺𑀤𑀦𑁆𑀢𑀺 𑀯𑀻𑀢𑀫𑁄𑀳𑁄𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यो नाच्‍चसारी न पच्‍चसारी, सब्बं वितथमिदन्ति वीतमोहो।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 13 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यः नात्यासारति न प्रत्यसारति, सर्वं वितथमिदमिति वीतमोहः।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जो न अति शीघ्रगामी है और न अति मन्दगामी, जो सबको असार जान कर मोह-रहित हो गया है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।। 


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑀲𑁆𑀲𑀸𑀦𑀼𑀲𑀬𑀸 𑀦 𑀲𑀦𑁆𑀢𑀺 𑀓𑁂𑀘𑀺, 𑀫𑀽𑀮𑀸 𑀘 𑀅𑀓𑀼𑀲𑀮𑀸 𑀲𑀫𑀽𑀳𑀢𑀸𑀲𑁂𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यस्सानुसया न सन्ति केचि, मूला च अकुसला समूहतासे।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 14 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यस्यानुशयाः न सन्ति केचित्, मूलं च अकुशलं समूहृतं तस्य।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जिसमें किसी प्रकार का बुरा सत्कार नहीं, जिसकी बुराइयों की जड उखाड दी गई है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।। 


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑀲𑁆𑀲 𑀤𑀭𑀣𑀚𑀸 𑀦 𑀲𑀦𑁆𑀢𑀺 𑀓𑁂𑀘𑀺, 𑀑𑀭𑀁 𑀆𑀕𑀫𑀦𑀸𑀬 𑀧𑀘𑁆𑀘𑀢𑀬𑀸𑀲𑁂𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यस्स दरथजा न सन्ति केचि, ओरं आगमनाय पच्‍चयासे।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 15 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यस्य दारथजा न सन्ति केचित्, औरं आगमनाय प्रत्ययास्तस्य।

स भिक्षुः जहाति इह च परं च, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्॥


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जिसमें भवसागर में पडने की प्रत्ययभूत किसी प्रकार की चिन्ता नहीं है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।। 


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑀲𑁆𑀲 𑀯𑀦𑀣𑀚𑀸 𑀦 𑀲𑀦𑁆𑀢𑀺 𑀓𑁂𑀘𑀺, 𑀯𑀺𑀦𑀺𑀩𑀦𑁆𑀥𑀸𑀬 𑀪𑀯𑀸𑀬 𑀳𑁂𑀢𑀼𑀓𑀧𑁆𑀧𑀸𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यस्स वनथजा न सन्ति केचि, विनिबन्धाय भवाय हेतुकप्पा।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 16 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यस्य वन्थजा न सन्ती काश्चित्, विनिबन्धाय भवाय हेतुकृता।

स भिक्षुः जहाति उभयं च पारं, उरगो जीर्णमिव त्वचं पुराणम्।।


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जिसमें भव-बन्धन के हेतुभूत किसी प्रकार की तृष्णा नहीं है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।। 


𑀧𑀸𑀮𑀺 𑀪𑀸𑀲𑀸 𑁋 𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺

𑀬𑁄 𑀦𑀻𑀯𑀭𑀡𑁂 𑀧𑀳𑀸𑀬 𑀧𑀜𑁆𑀘,, 𑀅𑀦𑀺𑀖𑁄 𑀢𑀺𑀡𑁆𑀡𑀓𑀣𑀁𑀓𑀣𑁄 𑀯𑀺𑀲𑀮𑁆𑀮𑁄𑀦𑁇

𑀲𑁄 𑀪𑀺𑀓𑁆𑀔𑀼 𑀚𑀳𑀸𑀢𑀺 𑀑𑀭𑀧𑀸𑀭𑀁, 𑀉𑀭𑀕𑁄 𑀚𑀺𑀡𑁆𑀡𑀫𑀺𑀯𑀢𑁆𑀢𑀘𑀁 𑀧𑀼𑀭𑀸𑀡𑀁𑁈


पालि भासा - नागरी लिपि

यो नीवरणे पहाय पञ्‍च, अनिघो तिण्णकथंकथो विसल्‍लो।

सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्णमिवत्तचं पुराणं ।। 17 ।।


संस्कृत भाषाः - नागरी लिपि

यः निवारणानि पहाय पञ्च, अनीघः तीर्णकथंकथः विशालः।

स भिक्षुः जहाति उभयं च पारं, उरगः जीर्णमिव त्वचं पुराणम्।।


हिन्दी भाषा - नागरी लिपि

जो पाँच नीवरणों को नष्ट कर निष्पाप, नि शङ्क और मुक्त हो गया है, वह भिक्षु इस पार तथा उस पार को छोडता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को।। 


𑀉𑀭𑀕𑀲𑀼𑀢𑁆𑀢𑀁 𑀧𑀞𑀫𑀁 𑀦𑀺𑀝𑁆𑀞𑀺𑀢𑀁𑁇


उरगसुत्तं पठमं निट्ठितं।


उरगसुत्तं प्रथमं समाप्तम्।


उरगसुत्त समाप्त।




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