Dhaniyasutta | धनियसुत्त

Dhaniyasutta | धनियसुत्त 

धनिय सुत्त, सुत्तनिपात के उरग वग्ग का दुसरा सुत्त है। इस सुत्त में धनिय गोप अपनी सांसारिक संपत्तियों (भोजन, कुटिया, गायें, पत्नी, पुत्र) और सुखों का वर्णन करता है, जबकि भगवान बुद्ध अपनी आध्यात्मिक मुक्ति, बंधनों से छुटकारा, और तृष्णा-रहित अवस्था का वर्णन करते हैं। दोनों के दृष्टिकोणों की तुलना वर्षा के प्रतीक के साथ की गई है, जो सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन की चुनौतियों को दर्शाती है। अंत में, धनिय बुद्ध के शरण में जाता है और पवित्र जीवन जीने का संकल्प लेता है। मार और बुद्ध का अंतिम संवाद इस बात पर जोर देता है कि सांसारिक बंधन आनंद और शोक दोनों का कारण हैं, जबकि मुक्ति ही सच्चा सुख है।

Dhaniyasutta

भासा पालि - लिपि देवनागरी
पक्को दनो दुद्धखीरोहमस्मि, (इति धनियो गोपो)
अनुतीरे महिया समानवासो।
छन्ना कुटि आहितो गिनिअथ चे पत्थयसी पवस्स देव॥ 18 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

भात मेरा पक चुका, दूध दुह लिया, मही नदी के तीर पर स्वजनों के साथ वास करता हूँ। कुटी छा ली है, आग सुलगा ली है। अब, हे देव! चाहो तो खूब बरसो।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
अक्कोधनो विगतखिलोहमस्मि, (इति भगवा)
अनुतीरे महियेकरत्तिवासो।
विवटा कुटि निब्बुतो गिनिअथ चे पत्थयसी पवस्स देव॥ 19 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

मैं क्रोध और राग से रहित हूँ, एक रात के लिए मही नदी के तीर पर ठहरा हूँ, मेरी कुटी खुली है और (अन्दर की) आग बुझ चुकी है। अब, हे देव! चाहो तो खूब बरसो।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
अन्धकमकसा न विज्जिरे, (इति धनियो गोपो)
कच्छे रूळ्हतिणे चरन्ति गावो।
वुट्ठिम्पि सहेय्युमागतंअथ चे पत्थयसी पवस्स देव॥ 20 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

मक्खी और मच्छर यहाँ पर नहीं हैं। कछार में उगी घास को गौवें चरती हैं। पानी भी पड़े तो उसे वे सह लें। अब, हे देव! चाहो तो खूब बरसो।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
बद्धासि भिसी सुसङ्खता, (इति भगवा)
तिण्णो पारगतो विनेय्य ओघं।
अत्थो भिसिया न विज्जतिअथ चे पत्थयसी पवस्स देव॥ 21 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

मैंने एक अच्छी तरणी बना ली है। भवसागर को तरकर पार चला आया। अब तरणी की आवश्यकता नहीं। अब, हे देव! चाहो तो खूब बरसो।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
गोपी मम अस्सवा अलोला, (इति धनियो गोपो)
दीघरत्तं संवासिया मनापा।
तस्सा न सुणामि किञ्चि पापंअथ चे पत्थयसी पवस्स देव॥ 22 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

मेरी ग्वालिन आज्ञाकारिणी और अलोला है। वह चिरकाल की प्रिय सगिनी है। उसके विषय में कोई पाप भी नहीं सुनता। अब, हे देव! चाहो तो खूब बरसो।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
चित्तं मम अस्सवं विमुत्तं, (इति भगवा)
दीघरत्तं परिभावितं सुदन्तं।
पापं पन मे न विज्जतिअथ चे पत्थयसी पवस्स देव॥ 23 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

मेरा मन वशीभूत ओर विमुक्त है, चिरकाल से परिभावित और दान्त है। मुझ में कोई पाप नहीं। अब, हे देव! चाहो तो खूब बरसो।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
अत्तवेतनभतोहमस्मि, (इति धनियो गोपो)
पुत्ता च मे समानिया अरोगा।
तेसं न सुणामि किञ्चि पापंअथ चे पत्थयसी पवस्स देव॥ 24 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

मैं ाप अपनी हा मजदूरी करता हूँ। मेरी सन्तान अनुकूल और नीरोग है। उनके विषय में कोई पाप भी नहीं सुनता।अब, हे देव! चाहो तो खूब बरसो।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
नाहं भतकोस्मि कस्सचि, (इति भगवा)
निब्बिट्ठेन चरामि सब्बलोके।
अत्थो भतिया न विज्जतिअथ चे पत्थयसी पवस्स देव॥ 25 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

मैं किसी का चाकर नहीं, स्वच्छन्द सारे संसार में विचरण करता हूँ। मुझे चाकरी से मतलब नहीं। अब, हे देव! चाहो तो खूब बरसो।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
अत्थि वसा अत्थि धेनुपा, (इति धनियो गोपो)
गोधरणियो पवेणियोपि अत्थि।
उसभोपि गवम्पतीध अत्थिअथ चे पत्थयसी पवस्स देव॥ 26 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

मेरे तरुण बैल हैं और बछड़े हैं, गाभिन गायें हैं और तरुण गायें भी हैं, और सबके बीच वृषभराज भी हैं। अब, हे देव! चाहो तो खूब बरसो।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
नत्थि वसा नत्थि धेनुपा, (इति भगवा)
गोधरणियो पवेणियोपि नत्थि।
उसभोपि गवम्पतीध नत्थिअथ चे पत्थयसी पवस्स देव॥ 27 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

मेरे न तरुण बैल हैं, और न बछड़े, न गाभिन गायें हैं, और न तरुण गायें, और सबके बीच वृषभराज भी नहीं। अब, हे देव! चाहो तो खूब बरसो।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
खिला निखाता असम्पवेधी, (इति धनियो गोपो)
दामा मुञ्जलमया नवा सुसण्ठाना।
न हि सक्खिन्ति धेनुपापि छेत्तुंअथ चे पत्थयसी पवस्स देव॥ 28 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

खूँटे मजबूत गड़े हैं, मूंज के पगहे नये और अच्छी तरह बटे हैं, बैल भी उन्हें नहीं तोड़ सकते। अब, हे देव! चाहो तो खूब बरसो।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
उसभोरिव छेत्व बन्धनानि, (इति भगवा)
नागो पूतिलतंव दालयित्वा।
नाहं पुनुपेस्सं गब्भसेय्यंअथ चे पत्थयसी पवस्स देव॥ 29 ।।


भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

वृषभ जैसे बन्धनों को तोड़, हाथी जैसे पूतिल्ता को छिन्न-भिन्न कर मैं फिर जन्म ग्रहण नहीं करूँगा। अब, हे देव! चाहो तो खूब बरसो।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
निन्नसञ्च थलञ्च पूरयन्तोमहामेघो पवस्सि तावदेव।
सुत्वा देवस्स वस्सतोइममत्थं धनियो अभासथ॥ 30 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

उसी समय ऊँची नीची भूमि को भरती हुई जोरों की बारिस हुई बरसते हुई बादलों के गर्जन को सुन धनिय ने यह कहा।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
लाभा वत नो अनप्पकाये मयं भगवन्तं अद्दसाम।
सरणं तं उपेम चक्खुमसत्था नो होहि तुवं महामुनि॥ 31 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

हमारा बड़ा लाभ हुआ कि हमने भगवान् के दर्शन पाये। हे चक्षुमान्! हम आप की शरण आते है, महामुनि! आप हमारे गुरु हों।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
गोपी च अहञ्च अस्सवाबम्भचरियं सुगते चरामसे।
जातिमरणस्स पारगूदुक्खस्सन्तकरा भवामसे॥ 32 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

गोपी और हम बुद्ध की आज्ञा में रह उनके धर्म का पालन करेंगे, फिर जन्म-मृत्यु को पार कर दुख का अन्त करेंगे।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
नन्दति पुत्तेहि पुत्तिमा, (इति मारो पापिमा)
गोमा गोहि तथेव नंदति।
उपधी हि नरस्स नंदनान हि सो नंदति यो निरूपधि॥ 33 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

पुत्रवाला पुत्रों से आनन्द मनाता है, उसी तरह गौवाला गौवो से। विषय-भोग ही मनुष्य के आनन्द के कारण हैं। जिन्हें विषय-भोग नहीं उन्हें आनन्द भी नहीं।।

भासा पालि - लिपि देवनागरी
सोचति पुत्तेहि पुत्तिमा, (इति भगवा)
गोमापि गोहि तथेव सोचति।
उपधी हि नरस्स सोचनान हि सो सोचति यो निरूपधी॥ 34 ।।

भाषा हिन्दी - लिपि देवनागरी

पुत्रवाला पुत्रों के कारण चिन्तित रहता है। उसी तरह गौवाला गौवों के कारण। विषय-भोग मनुष्य की चिन्ता के कारण हैं। जो विषय-रहित हैं, वे चिन्ता रहित हैं।

धनियसुत्त का सार

धनियसुत्त (सुत्तनिपात, उरगवग्ग का दूसरा सुत्त) एक संवाद-रूप काव्यात्मक सुत्त है जिसमें ग्वाला धनिय और भगवान बुद्ध के बीच वर्षा की रात्रि में वार्तालाप होता है। धनिय अपनी सांसारिक सम्पदा—भोजन, कुटिया, पत्नी, पुत्र, गायें आदि—पर गर्व करते हुए वर्षा के देवता को चुनौती देते हैं कि “चाहो तो खूब बरसो”, क्योंकि उनकी सम्पदा सुरक्षित है। इसके विपरीत बुद्ध अपनी आध्यात्मिक सम्पदा—क्रोध-राग से मुक्ति, तृष्णा का अभाव, बन्धनों से छुटकारा, निर्वाण-प्राप्ति—का वर्णन करते हुए उसी चुनौती को दोहराते हैं, क्योंकि उन्हें खोने को कुछ भी नहीं है।

अंत में जोरदार वर्षा होती है और बुद्ध के वचनों से प्रभावित होकर धनिय अपनी पत्नी सहित बुद्ध की शरण में जाता है तथा ब्रह्मचर्य जीवन अपनाने का संकल्प लेता है। इसके बाद मार (पापिमा) सांसारिक उपधियों (सम्पदाओं) को आनन्द का कारण बताता है, जिसका बुद्ध खण्डन करते हुए कहते हैं कि यही उपधियाँ शोक और चिन्ता का कारण भी हैं; निरुपधि (उपधि-रहित) व्यक्ति ही सच्चे सुख में स्थित होता है।

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