Kaludai | कालुदायी

Kaludai | कालुदायी

 

कालुदायी राजा सुद्धोधन के एक अमात्य (मन्त्री) के पुत्र थे। जिनका जन्म सुकिति (सिद्धार्थ) के जन्म दिवस के दिन ही हुआ था। वह सिद्धार्थ गोतम के बचपन के साथी भी थे।

बुद्धत्व लाभ के बाद जब भगवान् राजगृह के वेळुवन में विहरते थे उस समय राजा सुद्धोधन ने बुद्ध को लिवा लाने के लिए कई मन्त्रियों को भेजा। वे सब के सब भगवान के पास जाकर प्रव्रजित हो वहीं रह गये। अन्त में राजा ने कालुदाइ को भेजने का निश्चय किया। कालुदाइ इस शर्त पर जाने को तैयार हुए कि उन्हें प्रव्रजित होने की अनुमति मिले। राजा इसके लिये राजी हो गये। तब कालुदाइ कुछ साथियों को लेकर राजगृह गये। वहाँ भगवान् से उपदेश सुनकर प्रव्रजित हो अर्हत् पद को प्राप्त हुए। जब वर्षा की उतु (ऋतु) निकट आयी तो कालुदाइ ने भगवान को राजा का सन्देश सुनाया और उनसे जन्म-भूमि पधारने का अनुरोध करते हुए ऋतु का वर्णन इस प्रकार कियाः

 

‘‘अङ्गारिनो दानि दुमा भदन्ते, फलेसिनो छदनं विप्पहाय।

ते अच्‍चिमन्तोव पभासयन्ति, समयो महावीर भागी रसानं।। 528।।

भन्ते! अब वृक्ष अंगारों की भांति

(लाल लाल फूलों से) सज्जित हैं,

(मानो) फल की खोज में उन्होंने पत्तों को त्याग दिया है।

वे दीप-शिखा की भांति सुशोभित हैं।

भगीरथों (शाक्यों) पर अनुग्रह करने का समय है।।

 

‘‘दुमानि फुल्‍लानि मनोरमानि, समन्ततो सब्बदिसा पवन्ति।

पत्तं पहाय फलमाससाना कालो इतो पक्‍कमनाय वीर।।529।।

वृक्ष प्रफुल्लित हैं, मनोरम हैं

और चारों दिशाएँ सुवासित हैं।

(वृक्षो ने) फल की खोज में पत्तों को त्याग दिया है।

वीर! यहाँ से प्रस्थान का समय है।।

‘‘नेवातिसीतं न पनातिउण्हं, सुखा उतु अद्धनिया भदन्ते।

पस्सन्तु तं साकिया कोळिया च, पच्छामुखं रोहिनियं तरन्तं॥530।।

भन्ते! (अब) न तो अधिक शीत है

और न अधिक उष्ण है।

ऋतु सुखदाई है और लम्बी यात्रा के अनुकूल है।

पश्चिमाभिमुख हो रोहिनी को पार करते हुए (आपको)

शाक्य और कोलिय देखें।।

‘‘आसाय कसते खेत्तं, बीजं आसाय वप्पति।

आसाय वाणिजा यन्ति, समुद्दं धनहारका।

याय आसाय तिट्ठामि, सा मे आसा समिज्झतु॥531।।

किसान आशा से खेत जोतता है और

आशा से बीज बोती है।

वणिक धन प्राप्त करने के आशा से समुद्र से पार जाते हैं।

जिस आशा को लेकर मैं हूँ

मेरी उस आशा की पूर्ति हो।।

‘‘पुनप्पुनं चेव वपन्ति बीजं, पुनप्पुनं वस्सति देवराजा।

पुनप्पुनं खेत्तं कसन्ति कस्सका, पुनप्पुनं धञ्‍ञमुपेति रट्ठं॥532।।

(किसान) बारम्बार बीज बोते हैं।

देवराज बारम्बार वर्षा करता है।

किसान बारम्बार खेत को जोतते हैं।

बारम्बार राष्ट्र को धान मिलता है।।

‘‘पुनप्पुनं याचनका चरन्ति, पुनप्पुनं दानपती ददन्ति।

पुनप्पुनं दानपती ददित्वा, पुनप्पुनं सग्गमुपेन्ति ठानं॥533।।

याचक बारम्बार (भिक्खा के लिए) विचरते हैं।

दानपति बारम्बार दान देते हैं।

दानपति बारम्बार दान देकर

बारम्बार स्वर्गस्थान को प्राप्त होते हैं।।

‘‘वीरो हवे सत्तयुगं पुनेति, यस्मिं कुले जायति भूरिपञ्‍ञो।

मञ्‍ञामहं सक्‍कति देवदेवो, तया हि जातो  मुनि सच्‍चनामो॥534।।

जिस कुल में महा प्राज्ञ का जन्म होता है,

वीर उस कुल को सात पुश्तों के लिए पवित्र कर देते हैं।

शाक्य! आपको में देवातिदेव मानता हूँ।

आप यथार्थ मुनि के रूप में जन्मे हैं।।

‘‘सुद्धोदनो नाम पिता महेसिनो, बुद्धस्स माता पन मायनामा।

या बोधिसत्तं परिहरिय कुच्छिना, कायस्स भेदा तिदिवम्हि मोदति॥535।।

महर्षि के पिता का नाम सुद्धोधन है।

बुद्ध की माता का नाम माया है।

जो बोधिसत्व को गर्भ में धारण कर मृत्यु के बाद

देवलोक में प्रमोद करती है।।

‘‘सा गोतमी कालकता इतो चुता, दिब्बेहि कामेहि समङ्गिभूता।

सा मोदति कामगुणेहि पञ्‍चहि, परिवारिता देवगणेहि तेहि॥536।।

वह गोतमी यहाँ से गुजर कर

(अब) दिव्य कामों से परिपूर्ण है।

वह देवताओं की मण्डली के साथ

पाँच काम गुणों से प्रमोद करती है।।

‘‘बुद्धस्स पुत्तोम्हि असय्हसाहिनो, अङ्गीरसस्सप्पटिमस्स तादिनो।

पितुपिता मय्हं तुवंसि सक्‍क, धम्मेन मे गोतम अय्यकोसी’’ति॥537।।

असह्य को सहने वाले, अङ्गीरस,

अनुपम, अचल बुद्ध का मैं पुत्र हूँ।

आप मेरे धर्मानुकूल पितामह हैं।।537।।

कालुदायी ने भगवान बुद्ध से 60 गाथाओं में कपिलवस्तु चलने के लिए याचना की थी। जिसमें से 10 गाथाऐं थेरगाथा ग्रन्थ के दसवें निपात के महावग्ग में उपलब्ध हैं। कालुदायी ने भगवान बुद्ध से याचना की यह प्रसंग जातक निदान कथा में मिलता है।

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